गरीब सवर्णों के आर‍क्षण से जुड़े वो तीन पहलू जिन पर आज से सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Curated by अमित शुक्‍ला | नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated: Sep 13, 2022, 5:00 AM

गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण की व्‍यवस्‍था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। देश की सबसे बड़ी अदालत मामले में आज से सुनवाई शुरू करेगी। यह मामला चीफ जस्टिस यूयू ललित की अगुवाई वाली पांच सदस्‍यीय पीठ के पास है। सरकार के फैसलने को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कई ऐतराज जाहिर किए गए हैं।

हाइलाइट्स

  • गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण की व्‍यवस्‍था को चुनौती
  • आज से सुप्रीम कोर्ट शुरू करेगा मामले की सुनवाई
  • गरीब सवर्णों को आरक्षण व्‍यवस्‍था पर कई तरह के ऐतराज
नई दिल्‍ली: गरीब सवर्णों के लिए तय आरक्षण की व्‍यवस्‍था को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) इस व्‍यवस्‍था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज से सुनवाई शुरू करेगा। इस प्रावधान का विरोध करने वालों की दलील है कि यह संवैधानिक नजरिये से गलत है। आर्थिक आधार पर ऊंची जातियों को आरक्षण देने के प्रावधान को उन्‍होंने मजाक बताया है। तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने इस पर सख्‍त आपत्ति जताई है। यह मामला चीफ जस्टिस यूयू ललित की अगुवाई वाली पांच सदस्‍यीय पीठ के पास है। 103वें संविधान संशोधन के जरिये गरीब सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण (EWS) की व्यवस्था की गई है। इसमें मुख्‍य रूप से 3 बातों को लेकर ऐतराज जताया गया है।



इसमें ऐतराज का पहला मुद्दा ऊंची जातियों को शामिल करने पर है। चुनौती देने वाली याचिकाओं में कहा गया है कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक पिछड़ेपन को आधार बनाकर किया गया है। इसका मकसद शोषित वर्ग का सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करना है। आर्थिक स्थिति के आधार पर ऊंची जातियों को भी इस दायरे में ले आना आरक्षण का मजाक है।

आरक्षण की मूल भावना की दुहाई

आपत्ति का दूसरा बिंदु आरक्षण के मकसद को लेकर है। इस बाबत डीएमके के संगठन सचिव आरएस भारती ने पार्टी का लिखित बयान सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है। इसके मुताबिक, संविधान की नजर में आरक्षण तभी वैध है जब उसका मकसद सामाजिक समानता लाना हो। आर्थिक आधार पर इसका प्रावधान संवैधानिक रूप से वैध नहीं हो सकता। दरअसल, आरक्षण सामाजिक भेदभाव को कम करने की दिशा में बढ़ाया गया साकारात्मक कदम है। कथित उच्च जातियों को उनकी मौजूदा आर्थिक स्थिति से इतर आरक्षण देना इसकी मूल भावना के खिलाफ है।

सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों (EWS) को शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है। NEET एडमिशन में 10 फीसदी ईडब्लूएस कोटा दिए जाने के सरकार के फैसले को चुनौती दी गई तो याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कई सवाल किए। ऐसे में सरकार ने समीक्षा के लिए 30 नवंबर को एक समिति बना दी थी। बताया जाता है कि इस समिति ने 10 फीसदी ईडब्लूएस आरक्षण के तहत सामान्य श्रेणी के लिए सरकार की ओर से तय की गई 8 लाख रुपये सालाना आय की लिमिट में कोई बदलाव की सिफारिश नहीं की है।

दलील- आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं हो सकता

शीर्ष अदालत ने इंदिरा साहनी केस में कहा था कि पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का मकसद नौकरियों में भागीदारी के जरिये सामाजिक मकसद को पूरा करना है। अभी नौकरियों में अगड़ी जातियों का दबदबा है। यही ऐतराज के तीसरे पॉइंट को जन्‍म देता है। इसमें आरक्षण के आधार को समझने की बात कही गई है। डीएमके का कहना है कि नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं हो सकता। पूर्व में किए गए भेदभाव और अन्याय के मुआवजे के तौर पर आरक्षण की व्यवस्था की गई है। यह ऐतिहासिक भेदभाव के दुष्प्रभावों को दूर करने का साधन है।

सुप्रीम कोर्ट में ईडब्ल्यूएस कोटा के खिलाफ कई याचिकाएं दी गई हैं। इन पर सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस यूयू ललित की अगुवाई में पांच जजों की बेंच गठित की गई है। यह पीठ आज यानी 13 सितंबर से याचिकाओं की सुनवाई करेगी। तमिलनाडु देश का पहला ऐसा राज्य है जहां आरक्षण का दायरा 50% को पार कर गया है। यह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय सीमा से ज्यादा है।

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