माना तो मुसीबत, इनकार पर बवाल का डर… झारखंड में 77 प्रतिशत आरक्षण के प्रस्‍ताव से कैसे निपटेगा केंद्र?
नई दिल्ली: क्या झारखंड का नया आरक्षण प्रस्ताव केंद्र सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है? क्या ओबीसी और एससी-एसटी के लिए आरक्षण बढ़ाने के प्रस्ताव पर अंतिम फैसला लेना केंद्र सरकार के लिए आसान होगा? पिछले हफ्ते झारखंड की जेएमएम-कांग्रेस सरकार ने आरक्षण की सीमा को बढ़ाने का फैसला किया है। झारखंड सरकार का यह कदम केंद्र सरकार के लिए मुसीबत बन सकती है। झारखंड सरकार के फैसले के बाद राज्य में आरक्षण 77 फीसदी हो जाएगा। देश में यह सबसे ज्यादा आरक्षण देने वाला राज्य होगा। दूसरे स्थान पर तमिलनाडु है, जहां 69 फीसदी आरक्षण है।



क्या है फैसला?

झारखंड सरकार ने राज्य में पदों और सेवाओं की नियुक्ति में आरक्षण अधिनियम-2022 को पास किया है। इसमें सभी कैटिगरी के लिए आरक्षण सीमा को बढ़ाया गया है। इसके तहत ओबीसी आरक्षण 27 फीसदी कर दिया गया है। यह अब तक 14 फीसदी था।

राज्य सरकार आरक्षण के प्रस्ताव को विधानसभा से पास कराएगी। इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति जरूरी है। राज्य सरकार ने केंद्र से अनुशंसा करने का फैसला किया है कि कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। इससे बदलाव को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

झारखंड सरकार का दांव

हेमंत सोरेन इस फैसले से राज्य की बड़ी आबादी को साधने की कोशिश में हैं। आदिवासी समुदाय के लिए सरकार ने पहले ही कई फैसले लिए हैं। अब ओबीसी को साध कर वह राजनीतिक रूप से बीजेपी को बैकफुट पर लाना चाहते हैं। बीजेपी के आक्रामक हिंदुत्व का इसे काउंटर माना जा रहा है।

केंद्र के लिए क्या दिक्कत

केंद्र सरकार के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने वाले बिल पर कोई फैसला लेना आसान नहीं होगा। वह सीधे तौर पर मना भी नहीं कर सकती। अनुमति देने पर ऐसे बिल की बाढ़ आ जाएगी और दूसरे राज्य भी दबाव डालने लगेंगे। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को दिए गए आरक्षण पर सुनवाई कर रही है।

कई विपक्षी राज्य जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं। ऐसे में अगर केंद्र सरकार बिना किसी होमवर्क के झारखंड में आरक्षण की नई व्यवस्था लागू करती है, तो जातिगत जनगणना का दबाव और बढ़ सकता है। यह फैसला कई मोर्चे पर केंद्र की दिक्कतें बढ़ाने वाला हो सकता है।

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सरना धर्म कोड का दबाव

झारखंड सरकार पहले ही सरना धर्म कोड के जरिए केंद्र सरकार पर दबाव डाल चुकी है। झारखंड में भी बड़ी आबादी आदिवासी समुदाय की है। वर्षों से वे खुद को एक अलग समुदाय के रूप में देखते रहे हैं। जानकारों का कहना है कि 1941 तक जनगणना में धर्म कॉलम में जनजातियों के लिए अलग कॉलम रहता था। इसे 1951 में इस हटा दिया गया था।

सरना धर्म की वकालत करने वालों का तर्क है कि 1931 में आदिवासी समुदाय की आबादी 38.3% थी जो साल 2011 में कम होकर 26.02 प्रतिशत रह गई। सरना कोड के पास होने के बाद उनके लिए अलग धार्मिक कोड कानूनी तौर पर आ जाएगा। हेमंत सोरेन सरकार इससे जुड़ा बिल पासकर केंद्र सरकार के के पास भेज चुकी है। बीजेपी भी आदिवासी समुदाय का वोट लेने की होड़ में है, इसलिए वह बिल का खुलकर विरोध नहीं कर रही है। झारखंड विधानसभा में बीजेपी ने बिल का समर्थन किया था।

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