बिहार के चिराग के लिए PM मोदी का ‘हनुमान’ बने रहना मजबूरी, चाचा-भतीजे को लेकर BJP की क्या है प्लानिंग?

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रमाकांत चंदन

| नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated: Nov 26, 2022, 4:34 PM

Chirag Paswan News: बिहार की मौजूदा राजनीति में चिराग पासवान के लिए पीएम मोदी का हनुमान बने रहना मजबूरी जैसा दिख रहा है। राजनीतिक गलियारों में एक बात तो यह तय हो गई चाचा पशुपति पारस और भतीजा चिराग रहेंगे तो एनडीए के फोल्ड में ही। क्योंकि दोनों दलों का एटीट्यूड एंटी आरजेडी और एंटी कांग्रेस है।

हाइलाइट्स

  • बिहार में चिराग पासवान की राजनीति को लेकर सस्पेंस बरकरार
  • क्या चाचा पशुपति कुमार पारस और भतीजे चिराग पासवान आएंगे एक साथ
  • बीजेपी चाहती है, पशुपति और चिराग अलग-अलग ही रहें
  • चिराग के अलग रहने से बीजेपी के लिए आसान हो जाता है JDU को परेशान करना
पटना: राजनीतिक विशेषज्ञों का अनुमान कि चिराग और पशुपति पारस की पार्टी एक होकर एनडीए का हिस्सा बनी रहेगी, निर्मूल साबित हुआ। राजनीति की जरूरत पर तो यह होता दिख भी नहीं रहा था। लेकिन कयास के अपने कुछ गणित होते हैं। बहरहाल, आज तो चिराग गुट और पशपति पारस गुट ने दलित नेता रामविलास पासवान की जयंती अलग-अलग मना कर संभावनाओं के सारे बादल को अलविदा कह डाला। और पशुपति पारस ने तो पार्टी के मर्जर को सीधे नकार भी दिया। राजनीतिक गलियारों में एक बात तो यह तय हो गई चाचा पशुपति पारस और भतीजा चिराग रहेंगे तो एनडीए के फोल्ड में ही। क्योंकि दोनों दलों का एटीट्यूड एंटी आरजेडी और एंटी कांग्रेस है। चिराग पासवान युवा राजनीत को देखते तेजस्वी यादव के करीब हो रहे थे। लेकिन नीतीश कुमार के महागठबंधन में शामिल होते ही तेजस्वी और चिराग की राजनीत का जो एक रास्ता बन रहा था वह टूट गया। और अब चिराग के लिए एक रास्ता बचता है मोदी का हनुमान बने रहना।



चिराग की राजनीत का क्या रहेगा स्वरूप

जहां तक चिराग की राजनीति का सवाल है तो वह एक स्वतंत्र पार्टी की हैसियत के साथ बरकरार रहेगा। और एनडीए की छतरी के तले अपना विस्तार भी करेगा। इसकी कुछ खास वजह भी है। सबसे पहले तो पशुपति पारस की उम्र की वजह से पासवान या दुशाद की राजनीत पूरी तरह से चिराग की तरफ शिफ्ट होते दिखा। गत दिनों गोपालगंज और मोकामा चुनाव में यह दिखा भी। अब भी जिस जोशों खरोश से कुढ़नी उपचुनाव को चिराग ने गंभीरता से लिया है, यह उसे संदेश के लिए काफी है कि रामविलास पासवान के वोटर ने चिराग को अपना नेता माना है। दूसरी वजह है कि चिराग की उम्र कम है और वे भविष्य की राजनीति के लंबी रेस के घोड़े साबित होंगे।

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दरअसल, पशुपति पारस उम्र के बोझ तले राजनीत में सक्रिय भूमिका अब नहीं निभा पाएंगे। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि पारस बीजेपी के साथ चले जायेंगे और पार्टी को बीजेपी में मर्ज कर देंगे। उनके सांसद अपनी मर्जी से जहां जायेंगे वह उनके मन पर निर्भर करता है। ऐसे में महबूब अली केसर और वीणा सिंह संभवतः महागठबंधन की तरफ का रुखसत कर सकते हैं। लोजपा के चंदन सिंह बीजेपी में बने रह सकते हैं। जहां तक प्रिंस का सवाल है तो वह चिराग की तरफ ही पेंग बढ़ा रहे हैं।

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बीजेपी के रणनीतिकारों की माने तो वह चाहती है कि चिराग का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहे। इस अस्तित्व के साथ ही बीजेपी ने जेडीयू के कद को कम करने की रणनीति में कामयाब हुई थी। इसलिए बीजेपी उसके स्वतंत्र अस्तित्व की हिमायती है। और आगामी चुनाव में चिराग के इसी रूप में बीजेपी को लाभ हो सकता है।

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